Same day, a year ago I completed four precious years of my life, my college days. After that day friends scattered with a promise to stay in touch through calls, SMSes and frequent get togethers.
Poem below is a short summary of my four years of college, a tribute to my college life.
With my words and voice of Mr. Yashwant Mathur I dedicate this poem to my bestst friends in the world and coolest college life ever  



कुछ पल थे अजीब से 
कुछ दिन थे रंगीन से 
अपनी भी थी एक अलग ही हस्ती 
साथ बैठकर करते थे मस्ती 
समोसे थे रुपये पांच 
और गुमटी की चाय थी सस्ती 

उन दिनों नाम था अपना "जग्गी"  
रतन था "रोकी"
प्रकाश था "पि पि" 
Shrey  था अपना Financer
और इशान था Disco डांसर
तोसिफ का था सहारा 
और शुभम था लडकियों पर दिल हरा 
राजेश था नाकारा, और मनोज फिरता था मारा मारा 
हर्ष के तो क्या कहेने, वो तो था ही साला आवारा

लडकियों को देखकर सिटी बजाना
वो बेवजह की शर्तें लगाकर,
बिजली के खम्बे को पत्थर से खटखटाना
अगर TUBELIGHT  फूट जाये .. तो सरपट भागना ... 

क्यों याद है न रतन, 
वो पहेली मंजिल से कूद जाना
और फिर GUPTA SIR की गालियाँ खाना 

दोस्तों के TIFFIN  ताड़ कर, बीच LECTURE में खाना 
और फिर बाद में उन्हें समोसे खिलवाना
भरी बारिश में भीग जाना 
फिर MR 10 पर BIKE दौड़ाना

रात में जाग कर ED की SHEET बनाना
फिर, ढाई बजे पोहे खाने जाना ..
अब भी याद है वो WELCOME PARTY
जिसमे मेरा और उनका,  हाथों में हाथ लिए नाचना 

EXAMS की रातों में उल्लू जैसे पढना
NUMBER कम आये, तो SESSIONAL को रोना

नहीं भूल पाउँगा मैं,
असीमित हैं यादें ..
जिसमे करे थे अनगिनत वादें ..

हरपल था दोस्तों का साथ 
"जीत लें दुनिया" थी कुछ ऎसी थी बात 

लेकिन दोस्तों का हाथ जबसे छूटा
साला जीवन ही दगा दे बैठा .. 

अब नहीं रहा वो साथ
लेकिन दिल में हमेशा रहेंगे ये  दोस्त आबाद
जीवन की दौड़ धुप में सब है मगन 
रोकी फिर से है रतन ....
ना है कोई नाकारा
ना ही आवारा